“इतिहास गवाह है कि जहां नैतिकता और अर्थशाश्त्र के बीच संघर्ष होता है, वहां जीत हमेशा अर्थशाश्त्र की होती है। निहित स्वार्थों को तब तक स्वेच्छा से नहीं छोड़ा गया है जब तक कि मजबूर करने के लिए पर्याप्त बल ना लगाया गया हो।”